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August 9, 2020
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इसलिए मोदी पर इक्कीस साबित होते हैं केजरीवाल!

पायल बिस्वास :  ये बात देश का बच्चा जानता है कि दिल्ली में इस बार चुनाव में लड़ाई आम आदमी पार्टी यानी आप के अरविंद केजरीवाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच थी। ये बात भी देश की जनता जानती है कि लोगों को कनविंस कर खिलाफ हवा को अपनी ओर मोड़ लेने में नरेंद्र मोदी माहिर खिलाड़ी हैं और जब चौसर पर अमित शाह के फेंके हुए पास का साथ मिल जाता है तो खेल पूरी तरह से बदल जाता है। लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं हुआ और अरविंद केजरीवाल की सुनामी में ब्रांड मोदी का बैनर उखड़ गया। इसके बाद एक बार फिर केजरीवाल बनाम मोदी पर बहस तेज हो गई है। जेर ए बहस इस बात पर भी चल रही है कि एक ही तरह की राजनीति करनेवाले ये दोनों नेताओं में से केजरीवाल में ऐसा क्या खास है कि वो देश की राजधानी दिल्ली में राजनीति के सूमो नरेंद्र मोदी को धोबियापाट देकर वो खुद को इक्कीस साबित कर देते हैं। इतिहास के पन्ने के पलटकर देखें तो पाएंगे कि मोदी भले ही केजरीवाल की तुलना में राजनीति के पुराने खिलाड़ी हों लेकिन देश की राजनीति में दोनों का उभार लगभग एक ही समय और काल में हुआ है। तीन तीन बार गुजरात के सीएम रहे नरेंद्र मोदी को तब के बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ये सोचकर राष्ट्रीय राजनीति की फलक पर लाए थे कि जब बात पीए की कुर्सी संभालने की होगी तब वो एलके आडवाणी को धकियाकर कुर्सी पर बैठ जाएंगे। लेकिन यूपी के इस नेता से यहीं चूक हो गई। गुजरात से निकले मोदी साल 2013-14 से देश की राजनीति में ऐसे चमके कि आज उनके नाम का सिक्का पूरे देश में बोलता है।
वहीं इनकम टैक्स ऑफिसर रहते हुए एनजीओ चलानेवाले अरविंद केजरीवाल का नाम लोगों ने उस समय चुना जब रालेगणसिद्धी से निकलकर अन्ना हजारे ने जनलोकपाल को लेकर तब की मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में गदर काट दिया था। ईमानदारी की मिसाल बने इस आंदोलन में कई साहित्यकार, पत्रकार, फिल्मकार, कलाकार, वकील, प्रोफेसर और रिटायर्ड अफसरान भी आए। इसी आंदोलन में चुपके अरविंद केजरीवाल और पूर्व पत्रकार मनीष सिसोदिया की इंट्री हुई। सब मंच पर साथ रहते थे। लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी कि कब धरना खत्म करने को लेकर मंत्री सलमान खुर्शीद और केजरीवाल में डील हो गई। केजरीवाल ने अन्ना के कान में कुछ मंतर फूंका और धरना खत्म। सारे साथी हैरान। इसी हैरानीभरी से आंदोलन से केजरीवाल की राजनीति में इंट्री होती है और वो देखते ही देखते तीन तीन बार सीएम बन जाते हैं।
दोनों की राजनीति को समझने से पहले दोनों की राजनीति को समझना होगा। दोनों ही दिल खोलकर चुनावों में वादे करते हैं और सत्ता में आने के बाद उन वादों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। जब गाहे बगाहे उन वादों को लेकर हो हल्ला मचता है तो दोनों ही एक ऐसा नया मुद्दा हवामें उछाल देते हैं कि जनता सब भूल जाती है। जिस तरह से मोदी ने सबके खाते में पंद्रह लाख रुपए, अरबों-खरबों का काला धन वापिस लाएंगे, हर हाथ को काम, भ्रष्टाचार जड़ से मिटा देंगे और पीओके समेत पूरा कश्मीर हमारा होगा जैसे लुभावने नारे देकर जनता का दिल जीता। ठीक उसी तरह से केजरीवाल भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा, जनलोकपाल बिल लागू करेंगे, भ्रष्ट कांग्रेस और बीजेपी से दूरी रखेंगे, बाकी पार्टियों से अलग हटकर साफ सुथरी राजनीति करेंगे। लेकिन असलियत किसी सी छिपी नहीं है। अब समझिए वो क्या चीज है जो केजरीवाल को मोदी से बड़ा बना देती है। मोदी को पूरा देश संभालना है। देश की माली हालत से लेकर बॉर्डर तक की चुनौतियों से दो दो हाथ करना है। सभी राज्यों के साथ ईमानदारी बरते हुए फंड देना है। आपदाओं के समय में राज्यों के लिए चट्टान बनकर भी खड़ा होना पड़ता है। इसलिए कई बार जब उनके वादे पूरे नहीं होते तो उनपर सवाल खड़े होते हैं। लेकिन केजरीवाल इन सबसे बच जाते हैं। क्योंकि उनके पास लॉ एंड ऑर्डर चलाने के लिए ना कोई पुलिस है, ना सरकारी जमीन पर कोई अधिकार है और ना ही राजधानी की साफ सफाई की जिम्मेदारी लेनेवाला कोई नगरनिगम। इसलिए वो केवल गवर्नेंस के नाम पर इक्कीस पड़ जाते हैं। वो सरकारी स्कूलों में शिक्षा, झुग्गी झोपडियों में बिजली-पानी, परिवहन विभाग के तहत आनेवाली गाड़ियों के इंतजमात, स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत प्राइमिरी डिसपेंरी जैसे मुहल्ला क्लीनिक जैसे छोटे-छोटे लेकिन अहम मसलों के मालिक हैं। इन छोटे छोटे मोर्चे पर काम कर केजरीवाल ने ऐसा इमेज बना लिया कि मानों उन्होंने बड़ा काम किया है। उनकी छवि मजदूरों, मजलूमों और गरीबों के साथ खडे होनेवाली बन गई। बस केजरीवाल इसी की रोटी खाकर दिल्ली में मोदी से इक्कीस साबित हो रहे हैं।

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