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January 25, 2021
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हौसले और मौत के बीच संघर्ष : स्निग्धा ने किताबों को बनाया सच्चा दोस्त

गोरखपुर । जब किसी व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि वह एक ऐसी बीमारी से ग्रसित है, जिसका कोई इलाज नहीं है तो वह मानसिक रूप से बुरी तरह टूट जाता है। उसका सारा विकास और  प्रगति रुक जाती है। वह मौत से लड़ने में ही अपनी सारी ऊर्जा खपाने लग जाता है। लेकिन गोरखपुर शहर की एक लड़की न सिर्फ मौत रूपी बीमारी से लड़ रही है बल्कि अपने हौसले के पंखों को अत्याधिक मजबूत कर लिया है। यही कारण है कि वह लगातार एक के बाद एक सफलता हासिल करने में जुटी हुई है। इस संघर्ष में उसकी सबसे अच्छी दोस्त किताबें साथ दे रहीं हैं। अब नेट क्वालीफाई करने के बाद वह जेआरएफ की तैयारी में जुटीं है।

शहर के जेल बाईपास रोड की स्निग्धा चटर्जी को हर पल जान का खतरा है। ढाई माह की उम्र से मेजर थैलेसीमिया से पीड़ित स्निग्धा पूरे प्रदेश में एकमात्र ऐसी मरीज हैं, जिन्होंने सहायक प्रोफेसर बनने की पात्रता हासिल कर ली है। एलआईसी में अभिकर्ता सनत चटर्जी की 23 वर्षीय पुत्री स्निग्धा को हर 15 दिन पर दो यूनिट ब्लड की जरूरत है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के लिए महीने में दो बार लखनऊ जाना पड़ता है। इसमें दो दिन की भी देरी हो जाए तो उसकी सांसें उखड़ने लगती हैं। इसके बावजूद स्निग्धा ने बीमारी को कभी हावी नहीं होने दिया और लगातार चुनौतियों का सामना करते आगे बढ़ती गईं। एमकॉम अध्ययन के दौरान ही नेट क्वालीफाई कर लिया है। उल्लेखनीय है कि स्निग्धा ने अंतिम सेमेस्टर में 75 फीसदी अंक प्राप्त किया है।

और फैला लिया हौसले के पंख

इस स्थिति में अक्सर मरीज जुवान की आस छोड़ देता है, लेकिन स्निग्धा ने सांस फूलने के बाद स्कूल जाना नहीं छोड़ा। रोज स्कूल जाती थी। पढ़ाई पर भी अधिक समय ही देने लगी थी। मौत से शुरू हुए इस संघर्ष में किताबों को अपना साथी बना लिया। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा 80 फीसदी से अधिक अंकों के साथ पास किया। बीकॉम प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।

स्निग्धा बताती हैं कि उनका सपना अब प्रोफेसर बनने का है। नेट क्वालिफाई कर लिया है। जेआरएफ के लिए ट्राई कर रही हैं। जीवन में संघर्ष होना लाजिमी है। चाहे वह कोई समस्या हो अथवा बीमारी। हौसला बुलंद रहे और सकारात्मक प्रयास होता रहे तो एक दिन संघर्ष करने वाले कि जीत जरूर होती है।

क्या कहते हैं स्निग्धा के पिता

स्निग्धा के पिता सनत चटर्जी बताते हैं कि उनकी बेटी जब ढाई महीने की हुई, तब ही वह थैलेसीमिया मेजर से ग्रसित हो गई। इलाज के दौरान यह पता चला कि बीमारी लाइलाज है। महीने में दो से तीन बार ब्लड ट्रांसफ्यूज कराना पड़ेगा, तभी जान बची रहेगी। एक समय ऐसा भी आया जब हमने आस छोड़ दी थी। साल में 25 से 26 बार ट्रांसफ्यूजन से बेटी के हाथों की नसें सूखने लगीं थीं, वह दर्द से कराहती थी। बावजूद इसके स्निग्धा ने हार नहीं मानी।

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